पुरुषों की शारीरिक संरचना

पुरुषों की शरीरिक संरचना महिलाओं की अपेक्षा कम जटिल होती है. हालांकि इनमें भी बाल्यावस्था से यौवनावस्था तक काफी परिवर्तन होते है. पुरुषों की शारीरिक संरचना भी दो भागों में बांटी जा सकती है. उनमें एक वह संरचना जो बचपन से यौवन तक बदलती है और दूसरी वह जिसके तहत उसमें सेक्सुअल परिवर्तन आते हैं. इसे हम सेक्सुअल संरचना कह सकते हैं. यह भी दो प्रकार की होती है. बाह्य सेक्सुअल संरचना और आंतरिक सेक्सुअल संरचना. सेक्सुअल संरचना के प्रति खुलापन और जागरुकता आपको बेहतर प्रेमी( lover) बना सकती है. यह जानना कि आपके पार्टनर के सबसे संवेदनशील अंग कौन से हैं. उत्तेजना के दौरान उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है और कौन सा तरीका चरमोत्कर्ष और परम आनंद दे सकता है. यह न सिर्फ महिलाओं के लिये बल्कि पुरुषों के लिये भी जानना जरूरी है.
बाह्य सेक्सुअल संरचनाः
पुरुषों की बाह्य सेक्सुअल संरचना महिलाओं की अपेक्षा पूर्ण दृश्य और शरीर से बाहर लटकती है. इनमें लिंग और अण्डकोश थैली मुख्य हैं.

लिंग या शिश्न( Penis):
किसी पुरुष की सेक्स संरचना का यह मुख्य हिस्सा है. इसका कार्य मूत्र की निकासी और संभोग क्रिया के दौरान योनि में वीर्य निकासी करना है. लिंग का आकार आदमी और मूल के अनुसार बदलता रहता है. लिंग मांसपेशियों से घिरा रहता है और इसमें रक्त वाहिनी का अच्छा खासा जाल बिछा होता है( उत्तेजना के दौरान इन रक्त वाहिनियों में रक्तर जाने से लिंग का आकार बड़ा हो जाता है) लिंग की त्वचा (चमड़ी) पतली और काफी खिंचावदार होती है. इसमें कई संवेदनशील नसें होती हैं. जिनके स्पर्श से उत्तेजना का संचार होता है. यहां चित्र में लिंग की अवस्थाएं दिखाई गई हैं . चित्र (A) में लिंग की अग्र त्वचा कटी हुई है. चित्र (B) में अग्र त्वचा के साथ लिंग और अंतिम चित्र (C) मे उत्तेजित अवस्था में लिंग को दिखाया गया है. लिंग के पांच मुख्य भाग हैं जो बाहर से दिखाई देते हैं वे हैं-
· मूत्रनलिका द्वार( the urethral meatus)
· शिश्न मुण्ड( the glans or head)
· शिश्न पर्वत पृष्ठ( the corona)
· (the frenum)
· चर्म दण्ड( the shaft)
मूत्रनलिका द्वार( the urethral meatus):
शिश्न के मुख्य भाग चर्मदण्ड( shaft) और शिश्न मुण्ड( glans) होते हैं. इनके अंदरूनी हिस्से में एक नलिका होती है. जिसे मूत्रनलिका कहा जाता है. इस नलिका का अंतिम द्वारा जो शिश्न मुण्ड में खुलता है मूत्रनलिका द्वार (Urethral Meatus) कहलाता है. दूसरी ओर यह मूत्राशय में खुलती है जहां से मूत्र निकलता है. यह मूत्रनलिका शिश्न मुण्ड के शीर्ष में एक छिद्र या दरार के रूप में खुलती है. दोनों के खुलने के तरीके लगभग समान होते हैं. इसी नलिका से संभोग क्रिया के दौरान वीर्य उत्सर्जित होता है. मूत्रद्वार की स्थिति सामान्यतः शिश्न मुण्ड के बीच में होती है जो कि हेलमेट की आकृति का शिश्न के अंतिम छोर में होता है.

शिश्न मुण्ड( Glans):
शिश्न मुण्ड सर्वप्रथम दिखाए गए चित्र (A) में स्पष्ट दिखाई दे रहा है. शिश्न मुण्ड सामान्यतः अग्र त्वचा से ढंका रहता है यदि वह उत्तेजित अवस्था में नहीं होता है. लेकिन कुछ लोगों के शिश्न की अग्र त्वचा शिश्न मुण्ड के नीचे खिंची रहती है और मुस्लिमों में यह कटवा दी जाती है. शिश्न मुण्ड अत्यंत संवेदनशील होता है. मुख्यतः वहां पर जहां शिश्न पर्वत पृष्ठ (corona) शिश्न मुण्ड ((glans) और चर्म दण्ड (shaft) मिलता हैं.
शिश्न पर्वत पृष्ठ और फ्रेनम( Corona and Frenum):
शिश्न मुण्ड के निचले हिस्से के चारों ओर का वह छोटा उभरा हुआ किनारा शिश्न पर्वत पृष्ठ(करोना) कहलाता है. इसी से लगा हुआ वह स्थान जहां करोना छोटी v की आकृति बनाती है उसे फ्रेनल कहते हैं कई बार इस फ्रेनुलम के नाम से भी जाना जाता है. यह शिश्न का तीव्र संवेदनशील अंग है. विशेषतः यह उनके लिये ज्यादा संवेदनशील होता है जिनकी अग्र त्वचा शिश्न मुण्ड के नीचे से होती है.

चर्म दण्ड(Penis Shaft):
चर्म दण्ड मांसपेशियों का बना होता है. इसमें तीन उत्तेजक उत्तक नलिकाएं पाई जाती हैं. जिसमें काफी खाली स्थान होता है. उत्तेजना के दौरान इस खाली स्थान में रक्त प्रवाहित होता है. जो शिश्न को कठोर और बड़ा बना देता है. जब शिश्न उत्तेजित अवस्था में होता है तो त्वचा के नीचे स्थित नसे दिखाईदेने लगती हैं. यह शिश्न शरीर के अंदर काफी गहराई तक स्थित होता है. और इसकी जड़े गुदा के निकट स्थित प्रोस्टेट ग्रंथि तक जाती हैं. यह कई लोगों के लिये एक संवेदी उत्तक है जिन्हें स्खलन के लिये इस हिस्से से आनंद की अनुभूति होती है. यह हिस्सा गुदा (anus) और अण्डकोश थेली(scrotum)के बीच का होता है.

अग्र त्वचा (Foreskin):
अग्र त्वचा आगे पीछे सरकने वाली चमड़ी की नलिका होती है.जो शिश्न मुण्ड को ढंके हुए होती है और उसे सुऱक्षित आवरण देती है. अग्र त्वचा सामान्यतौर पर लिंग की उत्तेजना के दौरान पीछे की ओर सरक जाती है. कई लोगों की यह त्वचा हटा दी जाती है जिसे मुसलमानी करना कहते हैं. लिंग का अग्र त्वचा के बिना और उसके साथ अलग-अलग स्वरूप होता है, लेकिन उसके कार्य में कोई अन्तर नहीं आता है. हर आदमी अग्र त्वचा के साथ पैदा होता है. यदि उसके अभिभावक उसकी मुसलमानी करना चाहते हैं जो वह जन्म के पश्चात कर दी जाती है लेकिन इस अग्र त्वचा को हटाने का कोई चिकित्सकीय कारण नहीं है. अग्र त्वचा मुलतः एक ढीली त्वचा की नली के समान है जो नसों से भरी रहती है. जो कि शिश्न मुण्ड के नीचे स्थित चर्मदण्ड को घेरे रहती है. यह काफी संवेदनशील होती है. जब इसे छुआ जाता है. साथ ही संभोग क्रिया के दौरान स्खलन के लिये महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. सामान्य अवस्था में इस त्वचा का रंग शरीर की त्वचा के रंग से गहरा होता है और उत्तेजना के दौरान यह रंग हल्का हो जाता है.
स्मेग्मा(Smegma):
लिंग की चमड़ी के नीचे का चिकना पसेव स्मेग्मा कहलाता है. यह सफेद रंग का गंध युक्त द्रव्य होता है जो फ्रेनुलम के दोनों ओर स्थित ग्रंथियों से छोड़ा जाता है. यह स्थिति उनमें होती है जिनके शिश्न मुण्ड में अग्र त्वचा पाई जाती है.
अण्डकोश थैली(Scrotum):
यह एक झिल्लानुमा थैली है जो शिश्न के नीचे की ओर झूलती रहती है. यह अपने अन्दर वृषण या अण्डकोष (पौरुष ग्रंथि) रखे रहती है. इस थैली का मुख्य काम अण्डकोष का तापमान 34 डिग्री बनाए रखना होता है. क्योंकि शुक्राणु बनने के लिये यह तापमान सहायक होता है. यह दो खानों में विभक्त होता है और दोनों खानों में एक-एक अण्डकोष रहता है. जब इसका तापमान गिरता है तो यह थैली तापमान स्थिर करने के लिये शरीर की ओर खिसक जाती है. इसलिये वृषण ठण्डे नहीं होने पाते.

1 टिप्पणी »

  1. tr Said:

    dil ki bat


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