पुरुषों की आंतरिक सेक्सुअल संरचना

कार्पस् गुहा( The Corpus Cavernosum / Spongiosum)
कई लोग लिंग उत्तेजना का कारण यह समझते है कि लिंग में रक्त प्रवाहित होने से यह होता है पर इनमें से ज्यादातर यह नहीं जानते कि यह रक्त जाता कहां है. जब रक्त लिंग में उत्तेजना के लिये प्रवाहित होता है तो यह उत्तकों से बनी दो स्पंजी संरचनाओं में जाता है. यह संरचना लिंग की लंबाई के समानान्तर होती है. इसमें से पहली corpus cavernosum लिंग के उपरी हिस्से की होती है तो दूसरी corpus spongiosum मूत्रनलिका के निकट से गुजरती है. इन्ही दोनों स्पंजी संरचनाओं में स्थित छोटी-छोटी धमनियों के जाल में जब सेक्स उत्तेजना के दौरान रक्त का प्रवाह होता है तोये कठोर होकर तन जाती हैं जिसकी वजह से लिंग में तनाव व कठोरता आ जाती है.

अण्डकोश थैली व वृषण(Scrotum and Testicles)
वृषण पुरुष जनन ग्रंथि कहलाते हैं जो कि अण्डकोष थैली मे पाए जाते हैं. यह पुरुषों में महत्वपूर्ण प्रजनन संरचना है. थैली पेशियों की दीवार की सहायता से दो भागों में विभक्त होती है और यही पेशियां वृषण का तापमान नियत रखने के लिये उसे शरीर के पास ले जाती हैं ताकि वृषण में शुक्राणु उत्पादन प्रभावित न हो. जब तापमान ज्यादा हो जाता है तब पेशियां आराम की स्थिति में आ जाती हैं और थैली अपना आकार बढ़ा लेती है ताकि वृषण की शरीर से दूरी बढ़ सके . इस तरीके से वृषण का बढ़ा हुआ तापमान पुनः घटने लगता है. वृषण का आकार बड़े बादाम की तरह होता है और यह स्पर्श और दबाव के प्रति संवेदनशील होते हैं. वृषण टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन और शुक्राणु का उत्पादन करते हैं.

शुक्रवाहिनी( The Epididymis)
यह एक छोटी संरचना है जो वृषण के उपर पाई जाती है. यह छोटी नलिकाओं के समूह की बनी होती है जिसमें शुक्राणु का भण्डारण होता है. इसी संरचना में शुक्राणु स्खलन होने के पूर्व तक स्थिर रहता है. यह संरचना और वृषण को थैली में स्परमैटिक कार्ड द्वारा सहारा दिया जाता है. यह कार्ड नसों और रक्तवाहिनियों का समूह होता है.

शुक्रनलिका( The Vas Deferens)
यह शुक्रवाहिनी (epididymis) और शुक्रथैली (seminal vesicles) को जोड़ने वाली नली है. यह शुक्रवाहिनी से शुरू होकर शुक्रथैली में खुलती है. जहां शुक्राणु में कई अन्य द्रव पदार्थ मिलकर वीर्य का निर्माण करते हैं. स्खलन के दौरान निकले कुल वीर्य में उसके कुल द्रव्यमान के २ से ५ फीसदी शुक्राणु होते हैं. शेष हिस्सा दूसरे द्रव्यों का होता है. ये द्रव्य अलग-अलग ग्रंथियों से निकलते हैं और स्खलन के पूर्व तक अलग-अलग जगहों से वीर्य में मिलते जाते हैं.

कॉपर्स ग्रंथि( The Cowper’s Glands)
कॉपर्स ग्रंथि मुख्यतः एक चिकने तरल द्रव का उत्पादन करती है. यह द्रव कई बार स्खलन से पूर्व तब बाहर आता है जब व्यक्ति चरम उत्तेजना में होता है. वीर्य स्खलन के पूर्व निकलने वाला यह चिकना और चिपचिपा द्रव मूत्रद्वार में स्थित अम्ल (जो मूत्र द्वारा बन जाता है) को निष्क्रिय कर देता है. यह अम्ल मूत्रद्वार में पेशाब करने के दौरान रह जाता है जो शुक्राणुओं के लिये हानिकारक होता है. इस तरह शुक्राणु को एसिड(अम्ल ) का कोई खतरा नहीं रहता है.

प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate gland)
यह बड़ी और आखरोट के आकार की होती है. यह मूत्रनलिका के छोटे हिस्से को घेरे रहती है जो कि मूत्राशय के ठीक नीचे होती है. यह उसे क्षेत्र को लक्ष्य करती है जहां शुक्र थैली मूत्राशय की ओर खाली होती है. इस तरह यह मूत्र को वीर्य में मिलने से रोकती है. यह ग्रंथि दबाव और स्पर्श के प्रति काफी संवेदनशील होती है. इसके अलावा यह अपने से निकले द्रव को भी वीर्य में मिलाती है. इसके पश्चात ही वीर्य स्खलन के लिये पूर्णतः तैयार होता है.

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