ओरल सेक्स से भी फैल सकता है एड्स

एड्स दरअसल स्वयं में कोई बीमारी नहीं है बल्कि यह एक लक्षण है. इसमें मानव अपनी प्राकृतिक प्रतिरक्षण क्षमता (रोगों से लड़ने की क्षमता) खो देता है. इसमें मामूली से मामूली रोग जैसे सर्दी जुखाम भी सहजता से हो जाते हैं और इनका ठीक होना मुश्किल हो जाता है और मरीज धीरे-धीरे इनकी गिरफ्त में आकर मौत के मुंह में समा जाता है. अभी तक सामान्यतौर पर यही कहा जाता है कि एड्‍स यौन संक्रमण द्वार, दूषित रक्तसे तथा गर्भवती मां से शिशु तक पहुंचता है.
यहां हम बात करेंगे यौन संक्रमण द्वारा एड्स के फैलाव की क्योंकि ज्यादातर एड्‍स फैलाव के मामले यौन संबंधों से ही सामने आए हैं. अभी तक यही कहा जाता है कि सामान्य सेक्स या समलैंगिक संबंधो से ही एड़स का फैलाव होता है लेकिन विगत दिवस रेड रिबन एक्सप्रेस से मिली जानकारी के अनुसार ओरल सेक्स से भी एड्स के वायरस (एचआईव्ही) आपके शरीर में प्रवेश कर सकते है.
इसकी वजह में बताया गया यौन संबंधो के दौरान दरअसल एड्स वायरस का फैलाव एक से दूसरे में जेनाइटलफ्लूड (genital fluid) अर्थात जननेन्द्रिय द्रव्य के माध्यम से होता है. इसमें वीर्य या फिर योनि मार्ग को स्निग्ध रखने वाले द्रव्य या अन्य भी हो सकते हैं ठीक इसी तरह पुरुषों में भी शिश्न मुण्ड से उत्सर्जित होने वाले द्रव्य भी शामिल हैं.
अब यदि कोई मुख मैथुन अर्थात ओरल सेक्स करता है और उसके मुंह में छाले या कहीं भी कटा-फटा या खरोंच के निसान हैं तो जेनाइटल फ्लूड के माध्यम से एचआईव्ही वायरस उसके मुंह के उस कटे अंगों या छालों से दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं .

दूसरा दाढ़ी या बाल बनवाने के दौरान भले ही उस्तरे या ब्लेड से कटने का खून न निकले लेकिन एचआईव्ही फैलने की संभावना बनी ही रहती है. इसमें बताया गया है कि उस्तरे या ब्लेड से दाढ़ी बनाने के दौरान त्वचा में कुछ माइक्रोन का हिस्सा कटता या छिलता ही है . इसका असर दाढ़ी या बाल बनवाने के दौरान होने वाली चुनमुनाहट के रूप में दिखता है यह चुनमुनाहट ही साबित करती है कि आपकी त्वचा में कटाव आया है भले ही वह नंगी आंखों से न दिखे लेकिन यह एड्स के लिये जिम्मेदार एचआईव्ही के प्रवेश के लिये पर्याप्त है.

ब्लड बैंक भी सुरक्षित नहीं-
क्या आप जानते हैं कि ब्लड बैंक जहां तमाम परीक्षणों के बाद रक्त निकाला जाता है वहां भी एड्स फैलने का खतरा बना रहता है. दरअसल इसमें जांच प्रक्रिया का दोष नहीं बल्कि इसमें एचआईव्ही वायरस की क्षमता है. इसकी वजह यह है कि एड्स संक्रमित व्यक्ति में शुरुआती 4 महीने तक एड्स के वायरस सामान्य जांच (रैपिड टेस्ट) में पकड़ में नहीं आते हैं . इसे विन्डो पीरियड कहा जाता है. यदि विन्डो पीरियड के दौरान कोई एचआईव्ही संक्रमित व्यक्ति किसी को अपना रक्त देता है तो वह पकड़ में नहीं आएगा लेकिन किसी दूसरे को यह संक्रमित रक्त एचआईव्ही का संक्रमण आसानी से दे देगा. इसलिये ब्लड बैंक से रक्त लेते या चढ़वाते वक्त यह जानना जरूरी है कि जिसका रक्त चढ़ाया जा रहा है उससे ब्लड बैंक के कर्मचारी चाल चलन की जानकारी निर्धारित फार्म में ले चुके हैं या नहीं जो कि सामान्य तौर पर नहीं लेते हैं.

एचआईवी के कारण एड्स कैसे होता है

एचआईवी सीडी4+टी कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। मनुष्य की रोग-प्रतिरोधी प्रणाली के ठीक तरह से काम करने के लिए इन कोशिकाओं का होना बहुत जरूरी है। चूंकि ये विषाणु इन कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं, इसलिए एचआईवी-पोजिटिव लोग ऐसे रोगों के आसान शिकार बन जाते हैं, जो स्वस्थ रोग-प्रतिरोधी क्षमता रखनेवाले व्यक्तियों को आमतौर पर प्रभावित नहीं करते। हजारों व्यक्तियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अधिकांश एचआईवी-पोजिटिव लोगों में यह विषाणु सालों तक विद्यमान रहता है, और तब जाकर वह उनकी रोग-प्रतिरोधी प्रणाली को इतना नुकसान कर पाता है कि ये लोग एड्स से जुड़े रोगों की चपेट में आ जाएं। ऐसे परीक्षण उपलब्ध हैं जो खून में एचआईवी की मात्रा का आकलन कर सकते हैं, जिसे विषाणु बोझ कहा जाता है। जिन लोगों में अधिक विषाणु बोझ होता है, उनमें इसकी अधिक संभावना रहती है कि वे एड्स से जुड़े रोगों से बीमार हो जाएं और उनमें सीडी4+टी कोशिकाओं की संख्या में गिरावट आए। यदि ऐंटीरेट्रोवाइरल दवाओं से शरीर में विद्यमान विषाणुओं की संख्या को कम किया जाए, तो रोग-प्रतिरोधी प्रणाली के नष्ट होने की प्रक्रिया में उल्लेखनीय कमी आ जाती है और रोगों की प्रगति भी धीमी पड़ जाती है।

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